भगवद् गीता अध्याय ३ - कर्म योग
यह अध्याय कर्मयोग का सार है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों मुक्ति के मार्ग हैं, किंतु कर्म करना अनिवार्य है। निष्काम कर्म, यज्ञ भावना, और कर्तव्य पालन ही जीवन का आधार है। आज के समय में यह वर्क-लाइफ बैलेंस, ड्यूटी विदाउट एक्सपेक्टेशन, और सामाजिक जिम्मेदारी का मार्गदर्शन करता है।
अर्जुन उवाच ।
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥१॥
arjuna uvāca .
jyāyasī cetkarmaṇaste matā buddhirjanārdana .
tatkiṃ karmaṇi ghore māṃ niyojayasi keśava ॥1॥
अर्जुन बोले — हे जनार्दन! यदि तुम्हें कर्म से बुद्धि (ज्ञान) श्रेष्ठ लगती है, तो हे केशव! मुझे इस घोर कर्म (युद्ध) में क्यों लगाते हो?
गहरी व्याख्या: अर्जुन ज्ञानयोग को आसान समझता है। वह कर्म त्याग चाहता है। यह साधना में आलस्य का प्रतीक है। आज के समय में यह ध्यान करना चाहते हैं, किंतु काम नहीं की सोच है। श्रीकृष्ण कर्म की अनिवार्यता सिखाएँगे।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥२॥
vyāmiśreṇeva vākyena buddhiṃ mohayasīva me .
tadekaṃ vada niścitya yena śreyo'hamāpnuyām ॥2॥
तुम्हारे मिश्रित वचनों से मेरी बुद्धि मोहित-सी हो रही है। निश्चित रूप से एक मार्ग बता दो जिससे मैं कल्याण पाऊँ।
गहरी व्याख्या: अर्जुन स्पष्टता माँगता है। यह मार्गदर्शन की आवश्यकता है। आज के समय में यह करियर काउंसलिंग की तरह है।
श्रीभगवानुवाच ।
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥३॥
śrībhagavānuvāca .
loke'smindvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha .
jñānayogena sāṅkhyānāṃ karmayogena yoginām ॥3॥
श्रीकृष्ण बोले — हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठाएँ मैंने पहले बताईं — सांख्यों का ज्ञानयोग और योगियों का कर्मयोग।
गहरी व्याख्या: दो मार्ग — ज्ञान (संन्यास) और कर्म (गृहस्थ)। दोनों मुक्ति देते हैं। यह विविधता में एकता सिखाता है।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥४॥
na karmaṇāmanārambhānnaiṣkarmyaṃ puruṣo'śnute .
na ca saṃnyasanādeva siddhiṃ samadhigacchati ॥4॥
कर्मों का आरंभ न करने से मनुष्य निष्कर्मता (कर्मबन्धन से मुक्ति) नहीं पाता, और न संन्यास लेने मात्र से सिद्धि प्राप्त करता है।
गहरी व्याख्या: कर्म करना अनिवार्य है। निष्क्रियता मुक्ति नहीं देती। आज के समय में यह जॉब छोड़कर ध्यान करना की गलती सुधारता है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥५॥
na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt .
kāryate hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ ॥5॥
कोई भी क्षण भर के लिए कर्म किए बिना नहीं रहता। सभी प्रकृति के गुणों से बाध्य होकर कर्म करते हैं।
गहरी व्याख्या: प्रकृति के तीन गुण (सत, रज, तम) हमें कर्म करने को बाध्य करते हैं। यह जीवन की गति है।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥६॥
karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran .
indriyārthānvimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyate ॥6॥
जो इंद्रियों को रोककर मन से इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता है, वह मिथ्याचारी (पाखंडी) कहलाता है।
गहरी व्याख्या: बाहरी संन्यास, भीतरी आसक्ति = पाखंड। यह सच्चाई और दिखावा का अंतर सिखाता है।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥७॥
yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate'rjuna .
karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate ॥7॥
जो मन से इंद्रियों को वश में करके निष्काम भाव से कर्म करता है, वह श्रेष्ठ है।
गहरी व्याख्या: निष्काम कर्मयोग ही सच्चा योग है।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥८॥
niyataṃ kuru karma tvaṃ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ .
śarīrayātrāpi ca te na prasiddhyedakarmaṇaḥ ॥8॥
तुम नियत कर्म (कर्तव्य) करो। कर्म न करने से श्रेष्ठ है। अकर्म से शरीर यात्रा भी नहीं सिद्ध होती।
गहरी व्याख्या: जीविका के लिए कर्म अनिवार्य है। यह आलस्य की निंदा करता है।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥९॥
yajñārthātkarmaṇo'nyatra loko'yaṃ karmabandhanaḥ .
tadarthaṃ karma kaunteya muktasaṅgaḥ samācara ॥9॥
यज्ञ के लिए किए गए कर्म को छोड़कर अन्य कर्म बन्धनकारक हैं। हे कुन्तीपुत्र! यज्ञ भावना से कर्म करो, आसक्ति रहित होकर।
गहरी व्याख्या: यज्ञ = समर्पण। हर कर्म को ईश्वर को अर्पण करो।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१०॥
sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purovāca prajāpatiḥ .
anena prasaviṣyadhvameṣa vo'stviṣṭakāmadhuk ॥10॥
प्रजापति ने यज्ञ सहित प्रजा की सृष्टि कर कहा — इससे तुम्हारी वृद्धि होगी, यह तुम्हारी कामधेनु होगी।
गहरी व्याख्या: यज्ञ समाज का आधार है। यह सामाजिक जिम्मेदारी सिखाता है।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥११॥
devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ .
parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ॥11॥
इस यज्ञ से देवताओं को पोषित करो, वे तुम्हें पोषित करेंगे। परस्पर पोषण से परम श्रेय प्राप्त करोगे।
गहरी व्याख्या: प्रकृति और समाज का चक्र। यह पर्यावरण और सामाजिक संतुलन सिखाता है।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥१२॥
iṣṭānbhogānhi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ .
tairdattānapradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ ॥12॥
यज्ञ से पोषित देवता इच्छित भोग देंगे। उनके दिए बिना जो भोगता है, वह चोर है।
गहरी व्याख्या: कृतज्ञता और दान अनिवार्य। यह अर्जित धन का दुरुपयोग रोकता है।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥१३॥
yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ .
bhuñjate te tvaghaṃ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt ॥13॥
यज्ञ के अवशिष्ट भोजन करने वाले संत सभी पापों से मुक्त होते हैं। जो केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पाप भोगते हैं।
गहरी व्याख्या: स्वार्थी जीवन पाप है। यह दान और सेवा की महत्ता सिखाता है।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥१४॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥
annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ .
yajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ ॥14॥
karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam .
tasmātsarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam ॥15॥
जीव अन्न से, अन्न वर्षा से, वर्षा यज्ञ से, यज्ञ कर्म से। कर्म वेद से, वेद अक्षर ब्रह्म से। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में स्थित है।
गहरी व्याख्या: कर्म-यज्ञ-प्रकृति का चक्र। यह सृष्टि की एकता और कर्म की महत्ता सिखाता है।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥१६॥
evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ .
aghāyurindriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati ॥16॥
जो इस चक्र का अनुवर्तन नहीं करता, जो पापायु, इंद्रियों में रमण करने वाला है, वह व्यर्थ जीता है।
गहरी व्याख्या: समाज से अलगाव = व्यर्थ जीवन।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥१७॥
... (किंतु सामान्य मनुष्य के लिए कर्म अनिवार्य)
आत्मा में रमण करने वाले को कर्म की आवश्यकता नहीं। किंतु सामान्य जन को कर्मबन्धन से मुक्ति के लिए कर्म करना चाहिए।
गहरी व्याख्या: साधना के स्तर अलग-अलग।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥२०॥
... (मैं भी कर्म करता हूँ ताकि लोक भ्रमित न हो)
जनक आदि कर्म से सिद्ध हुए। लोकसंग्रह (समाज कल्याण) के लिए कर्म करो। श्रीकृष्ण कहते हैं — मैं भी कर्म करता हूँ ताकि लोग आलस्य न करें।
गहरी व्याख्या: नेतृत्व में उदाहरण।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥२७॥
... (नियतं कुरु कर्म, मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य)
प्रकृति के गुण कर्म करते हैं, अहंकार से मूढ़ आत्मा "मैं करता हूँ" सोचता है। ईश्वर को अर्पण करके कर्म करो।
गहरी व्याख्या: अहंकार त्याग = निष्काम कर्म।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ।
... परधर्मो भयावहः
स्वधर्म (अपना कर्तव्य) करने में पाप नहीं। परधर्म भयावह है।
गहरी व्याख्या: अपने क्षेत्र में रहो।
अर्जुन उवाच ।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥३६॥
... (इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः...)
अर्जुन पूछता है — पाप करने की प्रेरणा कहाँ से? श्रीकृष्ण बताते हैं — काम → क्रोध → बुद्धि नाश। इंद्रियों से मन, मन से बुद्धि, बुद्धि से आत्मा श्रेष्ठ। काम को इंद्रियों से जीतो।
गहरी व्याख्या: मानसिक स्वास्थ्य का विज्ञान।