भगवद् गीता अध्याय ४ - ज्ञान कर्म संन्यास योग
यह अध्याय ज्ञान और कर्म के बीच सेतु है। श्रीकृष्ण अवतारवाद, ज्ञान यज्ञ, कर्म संन्यास और निष्काम कर्म का रहस्य बताते हैं। वे स्वयं को सनातन अवतार घोषित करते हैं। यह अध्याय सच्चा संन्यास क्या है, ज्ञान की शक्ति, और कर्म की शुद्धि सिखाता है। आज के समय में यह सच्ची लीडरशिप, ज्ञान आधारित निर्णय और कर्म में निष्ठा का मार्गदर्शन करता है।
श्रीभगवानुवाच ।
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥
śrībhagavānuvāca .
imaṃ vivasvate yogaṃ proktavānahamavyayam .
vivasvānmanave prāha manurikṣvākave'bravīt ॥1॥
श्रीकृष्ण बोले — मैंने इस अव्यय योग को सूर्य (विवस्वान) को बताया, विवस्वान ने मनु को, मनु ने इक्ष्वाकु को।
गहरी व्याख्या: यह परंपरा का ज्ञान है। सूर्य → मनु → इक्ष्वाकु — यह गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक है। श्रीकृष्ण सनातन ज्ञान के वाहक हैं। आज के समय में यह ज्ञान संवाहक संस्थाएँ (स्कूल, गुरुकुल) की महत्ता बताता है।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥२॥
evaṃ paramparāprāptamimaṃ rājarṣayo viduḥ .
sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ parantapa ॥2॥
इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना। किंतु हे परंतप! दीर्घ काल में यह योग लुप्त हो गया।
गहरी व्याख्या: ज्ञान का ह्रास समय के साथ होता है। यह संरक्षण की आवश्यकता बताता है। आज के समय में यह सांस्कृतिक विरासत को बचाने की प्रेरणा देता है।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥
sa evāyaṃ mayā te'dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ .
bhakto'si me sakhā ceti rahasyaṃ hyetaduttamam ॥3॥
वही प्राचीन योग मैंने आज तुम्हें बताया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और सखा हो। यह परम रहस्य है।
गहरी व्याख्या: भक्ति और सखा भाव से ही रहस्यमय ज्ञान मिलता है। यह गुरु-शिष्य विश्वास की गहराई है।
अर्जुन उवाच ।
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥
arjuna uvāca .
aparaṃ bhavato janma paraṃ janma vivasvataḥ .
kathametadvijānīyāṃ tvamādau proktavāniti ॥4॥
अर्जुन बोले — आपका जन्म बाद का है, विवस्वान का पहले का। मैं कैसे मानूँ कि आपने ही आदि में यह योग बताया?
गहरी व्याख्या: अर्जुन का तार्किक प्रश्न। यह अवतारवाद की भूमिका है। आज के समय में यह विज्ञान vs आध्यात्म का संवाद है।
श्रीभगवानुवाच ।
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥५॥
śrībhagavānuvāca .
bahūni me vyatītāni janmāni tava cārjuna .
tānyahaṃ veda sarvāṇi na tvaṃ vettha parantapa ॥5॥
श्रीकृष्ण बोले — हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे बहुत जन्म बीत चुके। मैं उन सबको जानता हूँ, तुम नहीं जानते।
गहरी व्याख्या: भगवान की सर्वज्ञता vs जीव की सीमित स्मृति। यह पुनर्जन्म का प्रमाण है।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥
ajo'pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro'pi san .
prakṛtiṃ svāmadhiṣṭhāya saṃbhavāmyātmamāyayā ॥6॥
यद्यपि मैं अजन्मा, अव्यय, भूतों का ईश्वर हूँ, तथापि अपनी माया से प्रकृति को अधिष्ठित कर जन्म लेता हूँ।
गहरी व्याख्या: अवतार का रहस्य — ईश्वर प्रकृति पर नियंत्रण रखकर लीला करता है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥८॥
yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata .
abhyutthānamadharmasya tadātmānaṃ sṛjāmyaham ॥7॥
paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām .
dharma saṃsthāpanārthāya saṃbhavāmi yuge yuge ॥8॥
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए युग-युग में अवतार लेता हूँ।
गहरी व्याख्या: अवतारवाद का सार। यह सामाजिक सुधार और नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता बताता है।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥
janma karma ca me divyamevaṃ yo vetti tattvataḥ .
tyaktvā dehaṃ punarjanma naiti māmeti so'rjuna ॥9॥
जो मेरे दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्व से जानता है, वह देह त्याग कर पुनर्जन्म नहीं लेता, मुझे प्राप्त होता है।
गहरी व्याख्या: अवतार तत्त्वज्ञान = मोक्ष।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥१०॥
... (कर्मफल की इच्छा से पूजा)
राग, भय, क्रोध से मुक्त, मुझमें लीन, ज्ञान तप से शुद्ध — बहुतों ने मद्भाव प्राप्त किया। जो जैसे पूजता है, मैं उसे वैसा फल देता हूँ।
गहरी व्याख्या: ईश्वर निष्पक्ष, फल श्रद्धा और कर्म पर निर्भर।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥१३॥
cāturvarṇyaṃ mayā sṛṣṭaṃ guṇakarmavibhāgaśaḥ .
tasya kartāramapi māṃ viddhyakartāramavyayam ॥13॥
गुण और कर्म के विभाग से मैंने चार वर्ण बनाए। यद्यपि मैं उनका कर्ता हूँ, किंतु अकर्ता और अव्यय हूँ।
गहरी व्याख्या: वर्ण व्यवस्था गुण-कर्म आधारित, जन्म आधारित नहीं। यह सामाजिक संरचना का वैज्ञानिक आधार है।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥१४॥
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥१५॥
na māṃ karmāṇi limpanti na me karmaphale spṛhā .
iti māṃ yo'bhijānāti karmabhirna sa badhyate ॥14॥
evaṃ jñātvā kṛtaṃ karma pūrvairapi mumukṣubhiḥ .
kuru karmaiva tasmāttvaṃ pūrvaiḥ pūrvataraṃ kṛtam ॥15॥
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, न मैं फल की इच्छा करता हूँ। जो मुझे ऐसा जानता है, वह कर्मों से नहीं बंधता। पूर्वजों ने भी ऐसा जानकर कर्म किया। इसलिए तुम भी प्राचीन परंपरा से कर्म करो।
गहरी व्याख्या: निष्काम कर्म = मुक्ति।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥१६॥
... (कर्म, अकर्म, विकर्म)
कर्म क्या, अकर्म क्या — इसमें विद्वान भी मोहित हैं। कर्म = कर्तव्य, अकर्म = निष्काम कर्म, विकर्म = निषिद्ध कर्म।
गहरी व्याख्या: कर्म की परिभाषा — नियत कर्म निष्काम भाव से।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥१९॥
... (यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते)
कामना रहित, ज्ञानाग्नि से दग्ध कर्म — उसे पंडित कहते हैं। यज्ञ भाव से किया कर्म पूर्ण रूप से विलीन हो जाता है।
गहरी व्याख्या: ज्ञान यज्ञ = कर्म की शुद्धि।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥२४॥
... (द्रव्य, तप, योग, ज्ञान यज्ञ)
ब्रह्म में अर्पण, ब्रह्म हवि, ब्रह्म अग्नि — यह ब्रह्मकर्म समाधि है। द्रव्य, तप, योग, ज्ञान यज्ञ — सभी ब्रह्म में लीन होते हैं।
गहरी व्याख्या: सब कुछ ब्रह्ममय — यह अद्वैत दृष्टि है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥
... (तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः...)
ज्ञान यज्ञ द्रव्य यज्ञ से श्रेष्ठ। सभी कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं। श्रद्धा, संयम, ज्ञान खड्ग से अज्ञान को काटो।
गहरी व्याख्या: ज्ञान ही अंतिम मुक्ति है।