भगवद् गीता अध्याय ९ - राजविद्या राजगुह्य योग
यह अध्याय सबसे गोपनीय और राजसी ज्ञान है। श्रीकृष्ण कहते हैं — “मैं सबमें हूँ, सब मुझमें है”। भक्ति का फल तत्काल, अज्ञानी मूर्ख, सर्वत्र मेरा वास। आज के समय में यह क्वांटम फिजिक्स में ईश्वर, निष्काम भक्ति, और सर्वव्यापी चेतना का रहस्य खोलता है।
श्रीभगवानुवाच ।
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥१॥
śrībhagavānuvāca .
idaṃ tu te guhyatamaṃ pravakṣyāmyanasūyave .
jñānaṃ vijñānasahitaṃ yajjñātvā mokṣyase'śubhāt ॥1॥
श्रीकृष्ण बोले — तुझ दोषदृष्टि रहित को यह गुह्यतम ज्ञान विज्ञान सहित कहता हूँ — जिसे जानकर अशुभ से मुक्त हो जाएगा।
गहरी व्याख्या: **राजगुह्य = सबसे गोपनीय**। दोषदृष्टि न हो तो ज्ञान मिलता है।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥२॥
rājavidyā rājaguhyaṃ pavitramidamuttamam .
pratyakṣāvagamaṃ dharmyaṃ susukhaṃ kartumavyayam ॥2॥
यह राजविद्या, राजगुह्य, परम पवित्र, प्रत्यक्ष फल, धर्मयुक्त, सुख से करने योग्य, अव्यय है।
गहरी व्याख्या: **भक्ति = सबसे आसान और शाश्वत मार्ग**।
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥३॥
aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa .
aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravartmani ॥3॥
श्रद्धा न करने वाले इस धर्म को न पाकर मुझसे वंचित मृत्यु-संसार मार्ग में भटकते हैं।
गहरी व्याख्या: **श्रद्धा = भक्ति का बीज**। बिना श्रद्धा के भक्ति नहीं।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥४॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥५॥
mayā tatamidam sarvaṃ jagadavyaktamūrtinā .
matsthāni sarvabhūtāni na cāhaṃ teṣvavasthitaḥ ॥4॥
na ca matsthāni bhūtāni paśya me yogamaiśvaram .
bhūtabhṛnna ca bhūtastho mamātmā bhūtabhāvanaḥ ॥5॥
मैं अव्यक्त मूर्ति से इस सम्पूर्ण जगत को व्याप्त किया हूँ — सब भूत मुझमें स्थित, मैं उनमें नहीं। भूत मुझमें नहीं, देख मेरे ऐश्वर्य योग को — मैं भूतों को धारण करता हूँ, किंतु उनमें स्थित नहीं, मेरा आत्मा भूतों का भावन करता है।
गहरी व्याख्या: **क्वांटम फील्ड में चेतना** — ईश्वर सर्वत्र, किंतु अलग।
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥६॥
... (ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः)
जैसे महान वायु आकाश में स्थित रहता है, वैसे ही सब भूत मुझमें स्थित हैं। **सृष्टि के अंत में सब मेरे में लीन, फिर सृजन करता हूँ**। **प्रकृति मेरे अधीन कार्य करती है, भूतग्राम उत्पन्न करती है**। **अज्ञानी मुझे नहीं जानते, मूढ़ मानते हैं**। **मुझमें लीन भक्त मुझे जानते हैं**।
गहरी व्याख्या: **ईश्वर = कंट्रोलर**, **प्रकृति = टूल**।
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम सर्वं महेश्वरम् ॥११॥
... (ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते)
मूढ़ मुझे मानुष शरीर में देखकर तुच्छ मानते हैं — मेरे परम भाव को नहीं जानते। **उनका आश्रय व्यर्थ, कामना व्यर्थ**। **ज्ञानी एकत्व से, अनेक रूप से, विश्वरूप से मुझे पूजते हैं**।
गहरी व्याख्या: **अज्ञानी = बॉडी देखते**, **ज्ञानी = आत्मा देखते**।
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥१६॥
... (पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः)
मैं क्रतु, मैं यज्ञ, मैं स्वधा, मैं औषध, मैं मंत्र, मैं घी, मैं अग्नि, मैं हुत। **मैं पिता, माता, धाता, पितामह, वेद्य, पवित्र, ॐ, ऋग, साम, यजुः**। **गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सुहृद, प्रभव, प्रलय, स्थान, बीज, अव्यय**। **तपता सूर्य, वर्षा देता, मृत्यु, अमृत, सत्, असत्**।
गहरी व्याख्या: **हर पूजा में ईश्वर ही प्राप्त होता है**।
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥२०॥
... (यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः)
त्रयी धर्म वाले सोम पीकर यज्ञ से मुझे पूजकर स्वर्ग माँगते हैं — पुण्य से इंद्रलोक में देव भोग भोगते हैं, फिर लौटते हैं। **मेरे भक्त मेरे धाम को प्राप्त कर पुनरावृत्ति नहीं करते**। **देव पूजक देव, पितृ पूजक पितृ, भूत पूजक भूत, मुझे पूजने वाले मुझे प्राप्त करते हैं**।
गहरी व्याख्या: **किसी भी पूजा का फल सीमित**, **ईश्वर पूजा = अमर धाम**।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥२६॥
... (समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः)
जो भक्ति से पत्र, पुष्प, फल, जल मुझे अर्पित करता है — मैं उसे भक्ति से अर्पित ग्रहण करता हूँ। **जो कुछ करता है, खाता है, यज्ञ करता है, दान देता है — मुझे अर्पित कर**। **मैं सबमें सम, कोई द्वेष्य, कोई प्रिय नहीं — जो भक्ति करता है, वह मुझे प्रिय**। **पापी भी भक्ति से शुद्ध होकर श्रेष्ठ मार्ग पाता है**।
गहरी व्याख्या: **भक्ति = सबको समान अवसर**।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥३०॥
... (मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु)
अति दुराचारी भी अनन्य भक्ति करे तो साधु माना जाए — उसका संकल्प दृढ़ है। **शीघ्र धर्मात्मा होकर शांति पाता है**। **मेरे भक्त का नाश नहीं**। **स्त्री, वैश्य, शूद्र भी भक्ति से मुझे प्राप्त करते हैं**। **मन मुझमें, भक्त मेरा, यजी मेरा, मुझे नमस्कार कर — मुझे प्राप्त होगा**।
गहरी व्याख्या: **भक्ति = जाति, पाप से परे**।