भगवद् गीता अध्याय ६ - ध्यान योग
यह अध्याय ध्यान योग का सार है। श्रीकृष्ण मन के नियंत्रण, योगी के लक्षण, ध्यान की विधि, और आत्मसंयम का वर्णन करते हैं। योगी से बढ़कर कोई नहीं — यहाँ तक कि तपस्वी, ज्ञानी, कर्मी से भी श्रेष्ठ। आज के समय में यह मेडिटेशन, मेंटल हेल्थ, फोकस, और आत्म-नियंत्रण का वैज्ञानिक मार्गदर्शन है।
श्रीभगवानुवाच ।
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥१॥
śrībhagavānuvāca .
anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ .
sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ ॥1॥
श्रीकृष्ण बोले — जो कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्य कर्म करता है — वही सच्चा संन्यासी और योगी है। न अग्नि रहित, न अक्रिय।
गहरी व्याख्या: संन्यास कर्म त्याग नहीं, फल त्याग है। निष्काम कर्मी ही सच्चा योगी। आज के समय में यह ड्यूटी विदाउट रिवार्ड की भावना है।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥२॥
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava .
na hyasaṃnyastasaṅkalpo yogī bhavati kaścana ॥2॥
जिसे संन्यास कहते हैं, वही योग है, हे पाण्डव! संकल्प न त्यागने वाला कोई योगी नहीं होता।
गहरी व्याख्या: संकल्प = इच्छा। इच्छा रहित कर्म ही योग है।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥३॥
ārurukṣormuneryogaṃ karma kāraṇamucyate .
yogārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇamucyate ॥3॥
योग में चढ़ने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म कारण है। योगारूढ़ के लिए शम (मन का नियंत्रण) कारण है।
गहरी व्याख्या: शुरुआत में कर्म, अंत में ध्यान।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥४॥
yadā hi nendriyārtheṣu na karmasvanuṣajjate .
sarvasaṅkalpasaṃnyāsī yogārūḍhastadocyate ॥4॥
जब इंद्रियों के विषयों और कर्मों में आसक्त नहीं होता, सर्व संकल्प त्यागने वाला योगारूढ़ कहलाता है।
गहरी व्याख्या: योग की पराकाष्ठा = पूर्ण वैराग्य।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥५॥
uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet .
ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ ॥5॥
आत्मा से आत्मा को ऊपर उठाए, नीचे न गिराए। आत्मा ही आत्मा का मित्र और शत्रु है।
गहरी व्याख्या: स्वयं की जिम्मेदारी। आज के समय में यह सेल्फ-हेल्प और पर्सनल ग्रोथ का मूल मंत्र है।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६॥
bandhurātmātmanastasya yenātmaivātmanā jitaḥ .
anātmanastu śatrutve vartetātmaiva śatruvat ॥6॥
जिसने आत्मा से आत्मा को जीता, उसका आत्मा मित्र है। अनात्मा (असंयमी) के लिए आत्मा शत्रु की तरह व्यवहार करता है।
गहरी व्याख्या: मन का मालिक बनो, गुलाम नहीं।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥७॥
jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ .
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ ॥7॥
जितात्मा, प्रशांत के लिए परमात्मा समाहित रहता है — शीत-उष्ण, सुख-दुःख, मान-अपमान में।
गहरी व्याख्या: स्थिर बुद्धि = परमात्मा का निवास।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥८॥
jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ .
yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ ॥8॥
ज्ञान-विज्ञान से तृप्त, कूटस्थ, जितेन्द्रिय योगी — मिट्टी, पत्थर, सोना समान देखता है।
गहरी व्याख्या: समदृष्टि = योगी का लक्षण।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥
suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu .
sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate ॥9॥
सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, बंधु, साधु, पापी में समबुद्धि — वह श्रेष्ठ है।
गहरी व्याख्या: सर्वत्र समता — योगी की पहचान।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१०॥
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥११॥
... (ध्यायते चात्मानं, योगी विषयेन्द्रियसंयोगात्)
योगी एकांत में, एकाकी, चित्त संयत, निराशी, अपरिग्रही — शुद्ध स्थान में स्थिर आसन (न ऊँचा, न नीचा, घास-मृगचर्म-वस्त्र ऊपर) — मन को मुझमें लगाए। इंद्रियों को विषयों से हटाकर आत्मा में स्थिर करे।
गहरी व्याख्या: ध्यान की पूरी प्रक्रिया — स्थान, आसन, मन, लक्ष्य। आज के समय में यह मेडिटेशन टेक्नीक है।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥१६॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥१७॥
nātyaśnatastu yogo'sti na caikāntamanaśnataḥ .
na cātisvapnaśīlasya jāgrato naiva cārjuna ॥16॥
yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu .
yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā ॥17॥
अधिक खाने, न खाने, अधिक सोने, न सोने वाले का योग नहीं। युक्त आहार, विहार, कर्म, नींद-जागरण वाला योग दुःख नाश करता है।
गहरी व्याख्या: संतुलित जीवनशैली = योग का आधार।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥१८॥
... (योगी मन को आत्मा में स्थिर करे, जैसे दीपक स्थिर स्थान में)
जब चित्त आत्मा में स्थिर हो, सब कामनाओं से मुक्त — तब योगयुक्त कहलाता है। योगी का सुख — जैसे दीपक स्थिर स्थान में नहीं डगमगाता। इंद्रिय-निग्रह से जो सुख मिलता है, वह ब्रह्मसुख है।
गहरी व्याख्या: ध्यान में स्थिरता = परम सुख।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥२४॥
... (योगी ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करता है)
संकल्प से उत्पन्न कामनाएँ पूर्ण त्याग कर, मन से इंद्रियों को संयमित कर — योगी निरंतर ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करता है।
गहरी व्याख्या: ध्यान = ब्रह्म से मिलन।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥२९॥
... (सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते)
योगयुक्त आत्मा सबमें आत्मा और आत्मा में सब देखता है। सुख-दुःख में सम, सबका हित चाहने वाला — वह मेरे में स्थित है।
गहरी व्याख्या: अद्वैत दृष्टि — सबमें एक।
अर्जुन उवाच ।
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥३३॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥३४॥
arjuna uvāca .
yo'yaṃ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana .
etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvātsthitiṃ sthirām ॥33॥
cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavaddṛḍham .
tasyāhaṃ nigrahaṃ manye vāyoriva suduṣkaram ॥34॥
अर्जुन बोले — हे मधुसूदन! यह समता वाला योग मैं चंचल मन के कारण स्थिर नहीं देखता। मन चंचल, प्रबल, दृढ़ — इसे रोकना वायु रोकने जैसा कठिन है।
गहरी व्याख्या: सामान्य मन की समस्या — आज भी मेडिटेशन में एकाग्रता की कठिनाई।
श्रीभगवानुवाच ।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥३५॥
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥३६॥
śrībhagavānuvāca .
asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam .
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ॥35॥
asaṃyatātmanā yogo duṣprāpya iti me matiḥ .
vaśyātmanā tu yatatā śakyo'vāptumupāyataḥ ॥36॥
श्रीकृष्ण बोले — निःसंदेह मन चंचल और दुरिग्रह है, किंतु अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है। असंयत आत्मा को योग कठिन, संयत आत्मा को साधन से संभव है।
गहरी व्याख्या: अभ्यास + वैराग्य = मन का नियंत्रण।
अर्जुन उवाच ।
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥३७॥
... (योगभ्रष्ट पुण्यलोक में, फिर श्रेष्ठ कुल में जन्म)
अर्जुन पूछता है — योग से च्युत, श्रद्धावान का गति? श्रीकृष्ण: वह पुण्यलोक में, फिर श्रेष्ठ कुल में जन्म लेता है, पूर्व अभ्यास से योग फिर जुड़ जाता है।
गहरी व्याख्या: साधना कभी व्यर्थ नहीं।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६॥
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥४७॥
tapasvibhyo'dhiko yogī jñānibhyo'pi mato'dhikaḥ .
karmibhyaścādhiko yogī tasmādyogī bhavārjuna ॥46॥
yogināmapi sarveṣāṃ madgatenāntarātmanā .
śraddhāvānbhajate yo māṃ sa me yuktatamo mataḥ ॥47॥
योगी तपस्वी, ज्ञानी, कर्मी से श्रेष्ठ — इसलिए योगी बनो। सब योगियों में जो श्रद्धा से मुझमें मन लगाकर भजता है — वही मेरे मत में युक्ततम है।
गहरी व्याख्या: भक्ति सहित ध्यान = परम योग।