भगवद् गीता अध्याय २ - सांख्य योग

यह अध्याय गीता का सार है। श्रीकृष्ण अर्जुन के विषाद को दूर करते हैं और आत्मा की अमरता, कर्मयोग, स्थितप्रज्ञ और समत्व का उपदेश देते हैं। यह सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म) का संयोग है। आज के समय में यह तनाव प्रबंधन, कर्तव्य पालन और मानसिक संतुलन का मार्गदर्शन करता है।

सञ्जय उवाच ।
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥१॥

sañjaya uvāca .
taṃ tathā kṛpayāviṣṭamaśrupūrṇākulekṣaṇam .
viṣīdantamidaṃ vākyamuvāca madhusūdanaḥ ॥1॥

संजय बोले — उस करुणा से व्याप्त, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले, विषाद करते हुए अर्जुन से मधुसूदन (श्रीकृष्ण) ने यह वचन कहा।

गहरी व्याख्या: अर्जुन मोह में डूबा है। आँसुओं से भरी आँखें भावनात्मक कमजोरी दिखाती हैं। श्रीकृष्ण मधुसूदन (मधु दैत्य का वध करने वाले) कहलाते हैं — अर्थात अज्ञान रूपी दैत्य का नाश करने वाले। यह अध्याय अज्ञान से ज्ञान की यात्रा है। आज के समय में यह डिप्रेशन में गुरु की आवश्यकता सिखाता है।

श्रीभगवानुवाच ।
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥

śrībhagavānuvāca .
kutastvā kaśmalamidaṃ viṣame samupasthitam .
anāryajuṣṭamasvargyamakīrtikaramarjuna ॥2॥

श्रीकृष्ण बोले — हे अर्जुन! इस संकट के समय तुम्हें यह मोह कहाँ से प्राप्त हुआ? यह आर्य (श्रेष्ठ) के लिए अनुचित, स्वर्ग से वंचित करने वाला और अपकीर्ति कारक है।

गहरी व्याख्या: श्रीकृष्ण तीव्र शब्दों में अर्जुन को झकझोरते हैं। "अनार्य" कहकर कायरता की निंदा करते हैं। यह संकट में दृढ़ता सिखाता है। आज के समय में यह प्रेशर में हार न मानने की प्रेरणा देता है।

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥३॥

klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate .
kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa ॥3॥

हे पार्थ! नपुंसकता को मत अपनाओ, यह तुम्हारे योग्य नहीं। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता त्यागकर खड़े हो जाओ।

गहरी व्याख्या: "क्लैब्यं" = नपुंसकता — मानसिक कमजोरी। श्रीकृष्ण अर्जुन की क्षमता ("परंतप") की याद दिलाते हैं। यह आत्मविश्वास और उठने की प्रेरणा देता है।

अर्जुन उवाच ।
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥४॥

arjuna uvāca .
kathaṃ bhīṣmamahaṃ saṅkhye droṇaṃ ca madhusūdana .
iṣubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvarisūdana ॥4॥

अर्जुन बोले — हे मधुसूदन! मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण जैसे पूज्य पुरुषों पर बाण कैसे चलाऊँ? हे अरिसूदन!

गहरी व्याख्या: अर्जुन सम्मान और कर्तव्य के बीच फँसा है। यह नैतिक दुविधा है। आज के समय में यह बॉस या परिवार के खिलाफ निर्णय की तरह है।

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५॥

gurūnahatvā hi mahānubhāvān
śreyo bhoktuṃ bhaikṣyamapīha loke .
hatvārthakāmāṃstu gurūnihaiva
bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān ॥5॥

गुरुओं को न मारकर इस लोक में भिक्षा माँगना ही श्रेष्ठ है। गुरुओं को मारकर उनके धन-काम की इच्छा से प्राप्त भोग रक्तरंजित होंगे।

गहरी व्याख्या: अर्जुन पाप और अपराधबोध की बात करता है। यह कर्तव्य का परिणाम सोचने की गलती है।

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥६॥

na caitadvidmaḥ kataranno garīyo
yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ .
yāneva hatvā na jijīviṣāmas-
te'vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ ॥6॥

हम नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है — हम जीतें या वे। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे धृतराष्ट्र के पुत्र सामने खड़े हैं।

गहरी व्याख्या: अर्जुन जीत के बाद का दुख सोचता है। यह मोह का चरम है।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥७॥

kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ
pṛcchāmi tvāṃ dharmasaṃmūḍhacetāḥ .
yacchreyaḥ syānniścitaṃ brūhi tanme
śiṣyaste'haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam ॥7॥

कायरता दोष से ग्रस्त स्वभाव वाला, धर्म में मोहित चित्त वाला मैं तुमसे पूछता हूँ — मेरे लिए निश्चित कल्याण क्या है, बता दो। मैं तुम्हारा शिष्य हूँ, शरणागत हूँ, मुझे शिक्षा दो।

गहरी व्याख्या: यह शरणागति का क्षण है। अर्जुन गुरु की शरण लेता है। यह संकट में मार्गदर्शन माँगने का तरीका है।

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८॥

na hi prapaśyāmi mamāpanudyā-
dyacchokamucchoṣaṇamindriyāṇām .
avāpya bhūmāvasapatnamṛddhaṃ
rājyaṃ surāṇāmapi cādhipatyam ॥8॥

मैं नहीं देखता कि यह शोक मेरे इंद्रियों को सुखाने वाला कैसे दूर होगा, चाहे पृथ्वी पर अखंड समृद्ध राज्य मिले या देवताओं का स्वामित्व।

गहरी व्याख्या: अर्जुन भौतिक सुखों की सीमा स्वीकार करता है। यह आंतरिक शांति की खोज का प्रारंभ है।

सञ्जय उवाच ।
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥९॥

sañjaya uvāca .
evamuktvā hṛṣīkeśaṃ guḍākeśaḥ parantapa .
na yotsya iti govindamuktvā tūṣṇīṃ babhūva ha ॥9॥

संजय बोले — हे परंतप! अर्जुन ने हृषीकेश (कृष्ण) से ऐसा कहकर "मैं युद्ध नहीं करूँगा" कहकर मौन हो गया।

गहरी व्याख्या: अर्जुन पूर्ण समर्पण में मौन है। यह शिष्य की तैयारी है।

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥१०॥

tamuvāca hṛṣīkeśaḥ prahasanniva bhārata .
senayorubhayormadhye viṣīdantamidaṃ vacaḥ ॥10॥

हे भारत! दोनों सेनाओं के मध्य हृषीकेश (कृष्ण) ने विषाद करते हुए अर्जुन से हँसते हुए-से यह वचन कहा।

गहरी व्याख्या: "प्रहसन्निव" — दिव्य हास। यह अज्ञान पर करुणा है।

श्रीभगवानुवाच ।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥११॥

śrībhagavānuvāca .
aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase .
gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥ ॥11॥

श्रीकृष्ण बोले — तुम अशोचनीय (न शोक करने योग्य) के लिए शोक करते हो और पंडितों जैसे वचन बोलते हो। पंडित न मरे हुए के लिए शोक करते हैं, न जीवित के लिए।

गहरी व्याख्या: यह आत्मा की अमरता का प्रथम उपदेश है। शोक का कारण अज्ञान है। आज के समय में यह मृत्यु भय को दूर करता है।

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥१२॥

na tvevāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ .
na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayamataḥ param ॥12॥

न तो मैं कभी नहीं था, न तुम, न ये राजालोग। और न हम सब आगे नहीं रहेंगे।

गहरी व्याख्या: आत्मा शाश्वत है। यह पुनर्जन्म और नित्यता का सिद्धांत है।

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥१३॥

dehino'sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā .
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati ॥13॥

जैसे इस देह में देही (आत्मा) के लिए बाल्य, यौवन, वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य देह की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता।

गहरी व्याख्या: शरीर बदलता है, आत्मा नहीं। यह बुढ़ापे और मृत्यु का भय दूर करता है।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥१४॥

mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ .
āgamāpāyino'nityāstāṃstitikṣasva bhārata ॥14॥

हे कुन्तीपुत्र! इंद्रियों के विषयों का स्पर्श सर्दी-गर्मी, सुख-दुख देने वाला है। ये आगमन-पलायनशील और अनित्य हैं। हे भारत! इन्हें सहन करो।

गहरी व्याख्या: सुख-दुख क्षणिक हैं। यह धैर्य और समता सिखाता है।

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥१५॥

yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha .
samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so'mṛtatvāya kalpate ॥15॥

जिसे ये (सुख-दुख) व्यथित नहीं करते, जो सुख-दुख में समान और धीर है, वह अमृतत्व (मोक्ष) का पात्र है।

गहरी व्याख्या: स्थिर बुद्धि = मोक्ष का मार्ग

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६॥

nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ .
ubhayorapi dṛṣṭo'ntastvanayostattvadarśibhiḥ ॥16॥

असत् (अनित्य) का भाव (अस्तित्व) नहीं होता, सत् (नित्य) का अभाव नहीं होता। तत्त्वदर्शियों ने दोनों का अंत (सत्य) देखा है।

गहरी व्याख्या: ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या का सिद्धांत।

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥१७॥

avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṃ tatam .
vināśamavyayasyāsya na kaścitkartumarhati ॥17॥

जिससे यह सब व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। इस अव्यय का विनाश कोई नहीं कर सकता।

गहरी व्याख्या: आत्मा अविनाशी है।

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥१८॥

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ .
anāśino'prameyasya tasmādyudhyasva bhārata ॥18॥

ये शरीर अंत वाले हैं, किंतु आत्मा नित्य, अनाशी और अप्रमेय कहा गया है। इसलिए युद्ध करो, हे भारत!

गहरी व्याख्या: शरीर नश्वर, आत्मा अमर → युद्ध का भय व्यर्थ।

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥१९॥
... (शेष 11 श्लोक आत्मा के गुण — न जायते, न म्रियते, अग्नि नहीं जलाती, आदि)

आत्मा न जन्म लेती, न मरती। न शस्त्र काटते, न अग्नि जलाती, न वायु सुखाती, न जल गीला करता। यह नित्य, अजन्मा, अव्यय है।

गहरी व्याख्या: यह आत्मा का वैज्ञानिक वर्णन है। आज के समय में यह मृत्यु भय मुक्ति और आत्मविश्वास देता है।

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥३१॥

svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi .
dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate ॥31॥

अपने धर्म को देखकर भी तुम्हें कंपित नहीं होना चाहिए। क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से श्रेष्ठ कुछ नहीं।

गहरी व्याख्या: स्वधर्म पालन सर्वोपरि।

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥३२॥
... (जीत → राज्य, हार → स्वर्ग)

यह युद्ध स्वर्ग का खुला द्वार है। जीतोगे तो पृथ्वी, हारोगे तो स्वर्ग।

गहरी व्याख्या: क्षत्रिय के लिए युद्ध अवसर है।

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥३८॥

sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau .
tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpamavāpsyasi ॥38॥

सुख-दुख, लाभ-हानि, जीत-हार को समान करके युद्ध के लिए तैयार हो जाओ — ऐसा करने से पाप नहीं लगेगा।

गहरी व्याख्या: कर्मयोग का सार — निष्काम कर्म।

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥३९॥
... (स्थितप्रज्ञ के लक्षण — इंद्रियाँ वश में, समता, आदि)

सांख्य बुद्धि (ज्ञान) बताई, अब योग बुद्धि (कर्म) सुनो। स्थितप्रज्ञ की निशानियाँ — इंद्रियाँ वश में, मन स्थिर, सुख-दुख में समान।

गहरी व्याख्या: ज्ञान + कर्म = मुक्ति

अर्जुन उवाच ।
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥५४॥
... (श्रीकृष्ण का उत्तर — प्रजहाति यदा कामान्... तक)

अर्जुन पूछता है — स्थितप्रज्ञ की क्या निशानी? श्रीकृष्ण बताते हैं — जो कामनाओं को त्याग देता है, निःस्पृह, निर्भय, क्रोध-रहित रहता है, वह ब्रह्म में स्थित है।

गहरी व्याख्या: मानसिक स्वास्थ्य का आदर्श

अध्याय ३ - कर्म योग पढ़ें