भगवद् गीता अध्याय १३ - क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग

यह अध्याय आत्मा और देह का भेद सिखाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं — “देह क्षेत्र है, आत्मा क्षेत्रज्ञ”ज्ञान के 20 लक्षण, प्रकृति-पुरुष का मिलन, और मोक्ष का रहस्य। आज के समय में यह बॉडी vs सोल, कॉन्शसनेस vs मैटर, और सेल्फ रियलाइजेशन का वैज्ञानिक दर्शन है।

अर्जुन उवाच ।
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥२॥

arjuna uvāca .
prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva kṣetraṃ kṣetrajñam eva ca .
etad veditum icchāmi jñānaṃ jñeyaṃ ca keśava ॥1॥
śrībhagavānuvāca .
idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetram ity abhidhīyate .
etad yo vetti taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ ॥2॥

अर्जुन बोलेप्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान, ज्ञेय — जानना चाहता हूँश्रीकृष्ण बोलेयह शरीर क्षेत्र कहलाता है, इसे जो जानता है, उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं

गहरी व्याख्या: **देह = खेत**, **आत्मा = खेत का जानने वाला**।

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥३॥

सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जान — क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही ज्ञान मेरे मत में है

गहरी व्याख्या: **परमात्मा = सर्व क्षेत्रों का क्षेत्रज्ञ**।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥४॥
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥५॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥६॥

क्षेत्र क्या है, कैसा है, विकार क्या, कहाँ से — संक्षेप में सुनमहाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त, 10 इंद्रियाँ + 1 मन, 5 विषयइच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना, धृति — यह क्षेत्र विकार सहित कहा गया

गहरी व्याख्या: **क्षेत्र = भौतिक शरीर + मन + बुद्धि**।

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥७॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥८॥
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥९॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥१०॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥११॥

ज्ञान के 20 लक्षण:
1. अमानित्व, 2. अदम्भित्व, 3. अहिंसा, 4. क्षांति, 5. आर्जव
6. आचार्योपासन, 7. शौच, 8. स्थैर्य, 9. आत्मविनिग्रह
10. इंद्रियार्थ वैराग्य, 11. अनहंकार, 12. जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि दोष दर्शन
13. असक्ति, 14. पुत्र-दार-गृह में अनभिष्वंग, 15. इष्ट-अनिष्ट में समचित्त
16. अनन्य भक्ति, 17. विविक्त देश सेवन, 18. जनसंसदि अरति
19. अध्यात्म ज्ञान नित्यता, 20. तत्त्वज्ञानार्थ दर्शन

यह ज्ञान है, इसके विपरीत अज्ञान

गहरी व्याख्या: **ज्ञान = चरित्र**, **अज्ञान = अहंकार**।

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥१२॥
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१३॥
... (सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्)

ज्ञेय वह है जिसे जानकर अमृत प्राप्त होता है — अनादि, परम ब्रह्म, न सत्, न असत्सर्वत्र हाथ-पैर, नेत्र-शीश-मुख, श्रोत्र — सबको आवृत्य खड़ा हैइंद्रिय गुणों को प्रकाशित करता है, किंतु इंद्रियों से रहितबाह्य-अभ्यंतर भूतों का भर्ता, सूक्ष्म होने से अगोचर, दूर और निकटअविभक्त किंतु भूतों में विभक्त सा, भोक्ता, भर्ता, महेश्वरज्योति भी, अंधकार से परे, ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञानगम्य, सबके हृदय में स्थित

गहरी व्याख्या: **ज्ञेय = परमात्मा**, **सर्वव्यापी, किंतु अलग**।

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्चैव भूतानि विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥१९॥
... (पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्)

प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि जान — विकार और भूत प्रकृति से उत्पन्नकारण, कार्य, करण — प्रकृति से, भोक्तृत्व — पुरुष सेप्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति जनित गुणों को भोगता है

गहरी व्याख्या: **प्रकृति = माया**, **पुरुष = चेतना**।

कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ।
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥२३॥
... (प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि)

गुणों से संग — सत्-असत् योनि में जन्म का कारणउपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर, परमात्मा — यह पुरुष देह में पर हैजो ऐसा जानता है, वह मरकर भी नहीं मरता

गहरी व्याख्या: **आत्मज्ञान = अमरत्व**।

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥२७॥
... (प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः)

सब भूतों में सम परमेश्वर को स्थित, नष्ट होते हुए भी नष्ट न होने वाला — जो देखता है, वही देखता हैप्रकृति ही सब कर्म करवाती है, आत्मा अकर्ता — जो देखता है, वह मुक्त होता है

गहरी व्याख्या: **समदृष्टि = मोक्ष**।

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥३१॥
... (क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा)

जब भूतों के पृथक् भाव को एक में देखता है, और विस्तार उसी से — तब ब्रह्म को प्राप्त होता हैक्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का अंतर ज्ञान चक्षु से देखकर — वह मुक्त होता है

गहरी व्याख्या: **एकत्व दर्शन = ब्रह्म प्राप्ति**।

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