भगवद् गीता अध्याय १२ - भक्ति योग

यह अध्याय भक्ति का शुद्धतम स्वरूप है। विश्वरूप देखने के बाद अर्जुन पूछते हैं — सगुण भक्ति श्रेष्ठ या निर्गुण? श्रीकृष्ण कहते हैं — अनन्य भक्ति सबसे सरल और सर्वोत्तमभक्त के ३५ लक्षण और सर्वत्र सम दृष्टि। आज के समय में यह प्रेम का योग, रिलेशनशिप विद गॉड, और अनकंडीशनल लव का मार्ग है।

अर्जुन उवाच ।
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥१॥

arjuna uvāca .
evaṃ satata-yuktā ye bhaktās tvāṃ paryupāsate .
ye cāpy akṣaram avyaktaṃ teṣāṃ ke yoga-vittamāḥ ॥1॥

अर्जुन बोलेजो सतत युक्त होकर तुझे (सगुण) उपासते, और जो अक्षर अव्यक्त (निर्गुण) को — इनमें योगवित् कौन श्रेष्ठ?

गहरी व्याख्या: **विश्वरूप के बाद भक्ति का प्रश्न** — सगुण vs निर्गुण।

श्रीभगवानुवाच ।
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥२॥

श्रीकृष्ण बोलेजो मन मुझमें आवेश कर, नित्य युक्त, परम श्रद्धा से मुझे उपासते — वे मेरे मत में युक्ततम हैं

गहरी व्याख्या: **सगुण भक्ति = सबसे श्रेष्ठ** — क्योंकि आसान और प्रेमपूर्ण।

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥३॥
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥४॥

जो अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वत्रग, अचिंत्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव को उपासतेइंद्रियाँ संयम कर, सर्वत्र सम बुद्धि, सर्वभूत हित में रत — वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं

गहरी व्याख्या: **निर्गुण भक्ति = कठिन, लेकिन फल वही**।

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥५॥

अव्यक्त में आसक्त चित्त वालों का क्लेश अधिक — देहधारी को अव्यक्त गति दुःख से मिलती है

गहरी व्याख्या: **सगुण भक्ति = आसान पथ**।

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥६॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥७॥

जो सब कर्म मुझे अर्पण कर, मत्पर, अनन्य योग से मुझे ध्यान करते उपासतेउनके मैं शीघ्र मृत्यु-संसार-सागर से उद्धारक बनता हूँ, जिनका चित्त मुझमें आवेशित है

गहरी व्याख्या: **अनन्य भक्ति = तत्काल मुक्ति**।

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥८॥

मन को मुझमें ही लगा, बुद्धि मुझमें निवेश कर — फिर मुझमें ही निवास करेगा, ऊपर कोई संशय नहीं

गहरी व्याख्या: **पूर्ण समर्पण = ईश्वर में वास**।

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥९॥
अभ्यासेऽप्यशक्तोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥१०॥
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥११॥
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥१२॥

यदि चित्त स्थिर न कर सके, तो अभ्यास योग से मुझे प्राप्त करने की इच्छा करअभ्यास में भी असमर्थ, तो मत्कर्मपरम हो — मेरे लिए कर्म करने से सिद्धि मिलेगीयह भी न कर सके, तो मद्योग आश्रित होकर सर्वकर्मफल त्याग करज्ञान अभ्यास से श्रेष्ठ, ध्यान ज्ञान से, कर्मफल त्याग ध्यान से — त्याग से तत्काल शांति

गहरी व्याख्या: **भक्ति के ४ सीढ़ियाँ** — ध्यान → कर्म → त्याग → शांति।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥१३॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१४॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥१५॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१६॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥१७॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥१८॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥१९॥

जो सब भूतों से अद्वेष, मैत्री, करुणा, निर्मम, निरहंकार, समदुःखसुख, क्षमीसंतुष्ट, सतत योगी, यतात्मा, दृढ़ निश्चय, मन-बुद्धि मुझमें अर्पित — वह भक्त मुझे प्रिय

मुख्य लक्षण:
• अद्वेष्टा, मैत्रः, करुणा, निर्मम, निरहंकार
• समदुःखसुख, क्षमी, संतुष्ट, योगी
• मन-बुद्धि अर्पित, अनपेक्ष, शुचि, उदासीन
• सर्वारंभ परित्यागी, न हृष्यति-द्वेष्टि, शुभाशुभ त्यागी
• सम शत्रु-मित्र, मान-अपमान, सुख-दुःख
• तुल्य निंदा-स्तुति, मौनी, अनिकेत, स्थिरमति

गहरी व्याख्या: **भक्त = जीवित मुक्त** — दुनिया में रहकर भी परे।

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥२०॥

जो इस धर्म्य अमृत को जैसा कहा उपासते, श्रद्धा से मत्परम भक्त — वे मुझे अतीव प्रिय हैं

गहरी व्याख्या: **अनन्य भक्ति = ईश्वर का सबसे प्रिय**।

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